राजेंद्र राणा के बार-बार दल बदलने और मुख्यमंत्री सुक्खू के खिलाफ बगावत करने से भी लोगों के बीच नाराजगी को भी हार का कारण माना जा रहा है।
संदीप उपाध्याय
शिमला. सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के बागी और भाजपा के प्रत्याशी राजेंद्र राणा की हार पर मंथन हो रहा है। प्रदेश की सियासत में जितनी चर्चा उपचुनावों में कांग्रेस की जीत की हो रही है, उससे कहीं अधिक राजेंद्र राणा की हार की हो रही है। मीडिया से लेकर सोशल मीडिया और प्रदेश के सियासी गलियारों में राजेंद्र राणा की हार की चर्चा चरम पर है। चर्चा यही हो रही है कि राजेंद्र राणा मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू के सियासी चक्रव्यूह में फंसकर हार गए या फिर अपनों ने पीठ पर खंजर घोंपकर हरा दिया। कैप्टन रणजीत राणा जीते हैं, तो उनको मंथन की जरुरत नहीं है, राजेंद्र राणा हारे हैं, तो हार पर मंथन कर रहे हैं। अभी राजेंद्र राणा मंथन कर रहे हैं, लेकिन बोला कुछ नहीं है। शायद इसलिए कि अभी भाजपा में सियासत की लंबी पारी खेलनी है। भाजपा भी उपचुनाव में हार का मंथन करेगी और रिपोर्ट तलब भी करेगी।
राजेंद्र राणा की हार पर बड़ा सवाल यही है कि वर्ष 2017 में भाजपा के मुख्यमंत्री चेहरा रहे प्रेम कुमार धूमल को पराजित करने वाले राजेंद्र राणा उपचुनाव में प्रेम कुमार धूमल और अनुराग ठाकुर का साथ मिलने पर भी हार गए। ऐसा उपचुनाव, जो लोकसभा चुनावों के साथ हुआ, जिसमें भाजपा की स्थिति बहुत मजबूत थी और राजेंद्र राणा भाजपा प्रत्याशी के रुप में चुनाव मैदान में उतरे। सुजानपुर की ही बात करें तो राजेंद्र राणा 2400 के करीब वोटों से हारे हैं, तो लोकसभा प्रत्याशी अनुराग ठाकुर को 23 हजार से अधिक की लीड मिली है। अनुराग ठाकुर को संसदीय क्षेत्र की 17 विधानसभा क्षेत्रों में से सबसे अधिक लीड सुजानपुर से ही मिली है। साफ दिख रहा है कि सुजानपुर के करीब 25 हजार से अधिक मतदाताओं ने लोकसभा में भाजपा को वोट दिया लेकिन विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी राजेंद्र राणा को वोट नहीं दिया। विधानसभा के उपचुनावों में भाजपा प्रत्याशी को हराने और लोकसभा प्रत्याशी को जिताने के मतदाताओं के निर्णय की सराहना होनी चाहिए कि मतदाता अब जागरुक हैं और मत देते समय निर्णय लेने में सक्षम हैं।
पहले मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू की सियासी रणनीति को देखें तो चुनावों के दौरान साफ दिखा कि उपचुनावों में सुक्खू बागियों के खिलाफ बहुत ही आक्रामक रहे। बागियों पर खुलकर राजनैतिक मंडी में बिकने के आरोप दागे। चुनाव शुरु होने से लेकर अंत तक सुक्खू लगातार तीखे हमले करते रहे। सुक्खू के निशाने पर सभी बागी तो थे, लेकिन प्रमुख रुप से धर्मशाला से सुधीर शर्मा और सुजानपुर के राजेंद्र राणा थे। सुक्खू मानते हैं कि कांग्रेस से बगावत करने का षड़यंत्र इन्हीं दोनों नेताओं ने रचा है। धर्मशाला से सुधीर शर्मा जीत गए। मुख्यमंत्री के गृह जिले की बड़सर विधानसभा से इंद्रदत्त लखनपाल जीत गए, लेकिन सुजानपुर से राजेंद्र राणा हार गए। सुजानपुर में राजेंद्र राणा 20 साल से अधिक समय से सियासत कर रहे हैं। सुजानपुर से ही निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में चुनाव जीते और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर भाजपा के मुख्यमंत्री पद के घोषित चेहरे पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को भी हरा दिया। जिससे साबित होता है कि सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र में राजेंद्र राणा की जड़े बहुत मजबूत थीं। राजेंद्र राणा को हराना आसान नहीं था। अब राजेंद्र राणा हार गए हैं, तो मीडिया में सुर्खियां हैं कि सुक्खू की रणनीति में फंसकर राणा हार गए। यह बात सही भी हो सकती है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस पार्टी 6 में से 4 सीटों पर जीती है। यह मुख्यमंत्री सुक्खू की रणनीति का ही कमाल है।
अब मंथन के दूसरे पहलू पीठ पर खंजर घोंपकर हराने की चर्चा का विश्लेषण करते हैं। कांग्रेस से बगावत करने वाले राजेंद्र राणा के साथ सभी बागियों का संपर्क भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, राजीव बिंदल, विक्रम ठाकुर और हर्ष महाजन के साथ होने की खबरें मीडिया में होती रहीं। शिमला में हुए राज्यसभा के चुनावों में मतदान के समय विधानसभा से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस के बागियों के साथ यही नेता दिखते रहे और बोलते रहे। इस दौरान पूर्व मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने कांग्रेस के बागियों को लेकर सार्वजनिक रुप से कुछ नहीं बोला या कम ही बोला। जब सभी बागी दिल्ली में भाजपा में शामिल हुए, तो अनुराग ठाकुर मंच पर सभी को पटका पहनाते नजर आए। इस दिन सबसे अधिक अनुराग ठाकुर के द्वारा राजेंद्र राणा को पटका पहनाकर भाजपा में शामिल करने की चर्चा रही। इसका कारण था कि जिसने अनुराग ठाकुर के पिता प्रेम कुमार धूमल को 6 साल पहले ही हराया है, आज अनुराग ठाकुर उसे ही भाजपा में स्वागत कर शामिल कर रहे हैं। भाजपा में शामिल होकर राजेंद्र राणा भाजपा प्रत्याशी घोषित होकर सुजानपुर पहुंचे तो प्रेम कुमार धूमल का आशीर्वाद भी समीरपुर जाकर लिया। धूमल राजेंद्र राणा को जिताने के लिए सुजानपुर में प्रचार के लिए भी गए। धूमल के पुत्र और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर भी लगातार लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा में राणा को जिताने के लिए प्रचार करते रहे। प्रेमकुमार धूमल और अनुराग ठाकुर ने संगठन सर्वोपरि होता है, व्यक्ति नहीं, के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए पार्टी हाईकमान के निर्णय को स्वीकार किया और राजेंद्र राणा का साथ दिया। प्रचार के दौरान धूमल ने साफ कहा था कि जो कमल के फूल का निशान लेकर आए हैं, उनको जिताना है। जिससे साफ था कि धूमल कमल के फूल से बंधे हुए हैं।
कांग्रेस के 6 विधायकों के द्वारा बगावत कर भाजपा में शामिल होने और उपचुनावों में भाजपा का टिकट हासिल करने से भाजपा को बगावत का सामना करना पड़ा। 6 विधानसभा क्षेत्रों में से तीन में तो खुलकर बगावत हुई। सुजानपुर में कैप्टन राणा भाजपा छोड़कर कांग्रेस से टिकट हासिल करने में कामयाब रहे। वहीं धर्मशाला में राकेश चौधरी और लाहौल में रामलाल मारकंडे भाजपा से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़े। निर्दलीय लड़ने वाले यह दोनों नेता गत चुनावों में भाजपा के प्रत्याशी ही रहे हैं। इसी तरह बड़सर, कुटलैहड़ और गगरेट में भी विरोध के सुर उठे। भाजपा नेताओं की बगावत और रुठने से तय था कि चुनावों में कांग्रेस के बागी और भाजपा प्रत्याशियों को चुनावों में भितरघात से नुकसान होगा।
सुजानपुर की बात की जाए तो कांग्रेस प्रत्याशी के रुप में चुनाव लड़े और जीते कैप्टन रणजीत राणा डेढ़ साल पहले हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रत्याशी रहे हैं। कैप्टन को सुजानपुर में पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का राजनैतिक उत्तराधिकारी के रुप में देखा गया। 2017 में धूमल सुजानपुर से चुनाव लड़े और राजेंद्र राणा से हार गए। इसके बाद धूमल लगातार सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय रहे। 2022 के चुनावों में पार्टी ने धूमल को टिकट नहीं दिया, तो धूमल ने कैप्टन रणजीत राणा को टिकट दिलवा दिया। रणजीत राणा चुनाव लड़े और कड़े मुकाबला करते हुए बहुत कम मार्जिन करीब 300 वोट से राजेंद्र राणा से हार गए। इसके बाद कैप्टन लगातार सुजानपुर में सक्रिय रहे और भाजपा संगठन को मजबूत करते रहे। सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के मंडल से लेकर पंचायत स्तर तक के पन्ना प्रमुख सभी कैप्टन रणजीत राणा के साथ मिलकर काम करते रहे। अचानक उपचुनाव आ गए और चंद दिनों में रणजीत राणा भाजपा से कांग्रेस में आ गए। लेकिन भाजपा संगठन के सभी पदाधिकारी से लेकर कार्यकर्ताओं से रणजीत राणा के बेहतर संबंध रहे। सवाल यही है कि क्या भाजपा कार्यकर्ताओं के कैप्टन के साथ बेहतर संबंध और राजेंद्र राणा के खिलाफ पूर्व की नाराजगी के चलते पार्टी स्तर पर कहीं भीतरघात हुआ, जिससे राजेंद्र राणा हर गए। इस बात की भी सियासत में चर्चा हो रही है। हर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा में भितरघात हुआ होगा, इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि बागियों को भाजपा में शामिल करने और टिकट देने से पार्टी में बगावत खुलकर सामने आई। विरोध के सुर भी उठे, जिसे शांत करने के लिए प्रदेशाध्यक्ष राजीव बिंदल और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को बहुत मशक्कत करनी पड़ी। जिससे मंथन में निकली इस बात में भी दम है कि अपनों ने ही भितरघात कर हराया है। अब राणा के खिलाफ भितरघात हुआ है या फिर बार बार दलबदल करने और कांग्रेस से बगावत करने से लोगों ने नाराजगी जताई है, यह भी सोचने की बात है। राजेंद्र राणा ने अपनी सियासत पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के आशीर्वाद से ही शुरु हुई। सुजानपुर से भाजपा का टिकट न मिलने से राजेंद्र राणा निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते। इसके बाद राणा कांग्रेस में शामिल हो गए और कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े और जीते। अब फिर कांग्रेस से बगावत कर भाजपा में शामिल हो गए और चुनाव लड़े, हार गए। इस तरह राजेंद्र राणा के लगातार दलबदलने से भी जनता में नाराजगी हो सकती है। जिसके कारण राणा हार गए।
राजेंद्र राणा की हार पर लगातार मंथन और चचाएं होती रहेंगी। देखनी की बात यह होगी कि कब मंथन में निकले हार के कारणों का सार्वजनिक रुप से राजेंद्र राणा जनता के बीच रखेंगे या मौन रहकर ही उन कारणों को दूर कर आगे की सियासत करेंगे।
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