– हाईकमान के सामने होगी बड़ी चुनौती, किसे बनाएंगे मुख्यमंत्री पद का चेहरा
शिमला. प्रदेश के जननायक और कांग्रेस पार्टी के तारणहार वीरभद्र सिंह अब नहीं रहे। वीरभद्र सिंह के स्वर्ग सिधार जाने से कांग्रेस में नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। वीरभद्र सिंह का नाम ही कांग्रेस के लिए संजीवनी बूटी से कम नहीं था। वह थे तो कांग्रेस नेताओं के बीच कितना भी मतभेद हो लेकिन अंतिम निर्णय वीरभद्र सिंह का ही होता है। अपनी राजनैतिक कुशलता और प्रभावशाली नेतृत्व के कारण वीरभद्र सिंह अपने निर्णय पर सहमति बना लेते थे। यह तो तय है कि वीरभद्र सिंह का रिक्त स्थान भरा नहीं जा सकता। उनके पास कोई पद रहा और नहीं भी रहा, लेकिन वह कांग्रेस के एकछत्र नेता बने रहे और प्रदेश के लोगों के दिलों में राज करते हुए विदा हुए। राजा के अलविदा होने से कांग्रेस के सामने प्रदेश के नेतृत्व का संकट पैदा हो गया है। राजा वीरभद्र सिंह के बाद पार्टी में सेकेंड लाइन के नेताओं में कौल सिंह ठाकुर, जी.एस. बाली, मुकेश अग्निहोत्री,रामलाल ठाकुर, आशा कुमारी और सुखविंदर सिंह सुक्खू प्रमुख है। कांग्रेस के यह दिग्गज नेता एक – दूसरे के नाम पर आसानी से सहमति प्रकट कर दें, यह संभव नहीं दिखता। वर्तमान में कुलदीप सिंह राठौर पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष हैं तो मुकेश अग्निहोत्री विधानसभा में विपक्ष के नेता है। लेकिन अब कांग्रेस नेतृत्व पाने की जंग प्रमुख रुप से उपरोक्त छह नेताओं के बीच होनी है।
पार्टी में वरिष्ठता देखी जाए तो कौल सिंह ठाकुर, जी.एस. बाली, रामलाल ठाकुर और आशा कुमारी हैं तो मुकेश अग्निहोत्री और सुखविंदर सिंह सुक्खू अपने राजनैतिक कौशल और संघर्ष के कारण अंग्रिम पंक्ति के नेताओं में शामिल हैं। इनके आगे भी दाबेदारों की और लंबी लाइन है। नेतृत्व हासिल करने के दाबेदारों में आधा दर्जन नेता शामिल हैं लेकिन नेतृत्व तो एक ही को मिल सकता है। इन नामों में एक नाम पर सहमति बनाना ही कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती साबित होगी। अब यह तय है कि पार्टी के सभी सीनियर नेताओं के बीच नेतृत्व संभालने का संघर्ष तेज होगा, जिससे पार्टी में गुटबाजी भी बढ़ेगी। सभी नेता अपने – अपने समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन भी करेंगे और हाईकमान के दरबार में दस्तक भी देंगे। नेतृत्व की दाबेदारी करने वाले अधिकांश नेताओं को पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी के दरबार में सीधे एंट्री हैं। लेकिन पार्टी नेताओं के बीच एकजुटता बनाने का कार्य प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ला के हाथों होगी। वर्तमान में कांग्रेस नेताओं के बीच प्रदेशाध्यक्ष बनने की दौड़ शुरु होगी। कांग्रेस के समक्ष यह भी चुनौती होगी कि वह 2022 के विधानसभा चुनाव में किसे पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करे। कांग्रेस की वर्तमान की गुटबाजी को देखकर लगता नहीं है कि पार्टी हाईकमान किसी भी नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने में कामयाब होगा। कांग्रेस फिर यह फार्मूला बना सकती है कि चुनाव जीतकर आने वाले विधायक ही तय करेंगे कि उनका नेता कौन होगा। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि कांग्रेस के सीनियर नेता अब राजनीति में मुख्यमंत्री पद के लिए अंतिम लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को बहुमत मिलेगा तो यह होगा कि जिस नेता के समर्थन में अधिक विधायक होंगे, उसे ही कमान सौंपी जाएगी। यह सब कांग्रेसी जानते हैं जिससे सबका जोर होगा कि वह पहले प्रदेशाध्यक्ष की कमान संभाले और विधानसभा चुनाव में अपने समर्थक नेताओं को टिकट दिलाकर उन्हें जिताने का काम करें। जिससे चुने जाने वाले ज्यादा से ज्यादा विधायकों का समर्थन हासिल किया जा सके। लेकिन इस सब लड़ाई के लिए कांग्रेस को 2022 का विधानसभा चुनाव जीतना जरुरी है, जो सभी नेताओं की एकजुटता के साथ काम करके ही जीता जा सकता है। इसलिए हाईकमान का अभी इस बात पर जोर होगा कि पहले एकजुटता के साथ चुनाव जीतो फिर पद की बात की जाएगी। अब देखना होगा कि कौन नेता किस रणनीति के साथ काम कर नेतृत्व हासिल करने में सफल होता है।
मुकेश को बनाया विधानसभा में विपक्ष का नेता
विधानसभा चुनाव 2017 में कांग्रेस मिशन रिपीट नहीं कर सकी और विपक्षी दल के रुप में विधानसभा में पहुंची। समान्य तौर पर यही था कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ही विधानसभा में कांग्रेस के नेता होंगे। लेकिन अपने स्वास्थ्य कारणों ने पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने विधानसभ में विपक्ष का नेता बनने से इंकार कर दिया और मुकेश अग्निहोत्री को विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल का नेता बनाया। विधानसभा में विपक्ष के नेता कौन होगा, इस बारे में पार्टी हाईकमान ने विधायकों ने भी मशविरा किया था। पार्टी के अधिकांश विधायकों ने भी मुकेश अग्निहोत्री के नाम पर अपनी मुहर लगाई थी। इस चुनाव में पार्टी के सीनियर नेता कौल सिंह ठाकुर और जीएस बाली विधानसभा चुनाव हार गए थे जिससे वह इस दौड़ में शामिल ही नहीं हो सके। सुखविंदर सिंह सुक्खू उस समय कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रहे तो रामलाल ठाकुर और आशा कुमारी विधायक बनकर आए थे। लेकिन वीरभद्र सिंह के साथ विधायक मुकेश अग्निहोत्री के नाम पर सहमत थे, जिससे मुकेश अग्निहोत्री को विधानसभा में विपक्ष के नेता का दर्जा मिला।
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