अमृतसर, 8 जनवरी
विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने चंडीगढ़ प्रशासक के सलाहकार को मुख्य सचिव के पद पर पुनः नियुक्त करने के मोदी सरकार के हालिया फैसले की कड़ी निंदा की है और इसे शहर पर पंजाब के वैध दावे पर सीधा हमला बताया है। बाजवा ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि यह पंजाब की स्थिति को कमजोर करने और पंजाबी समुदाय को हाशिए पर डालने का जानबूझकर किया गया प्रयास है, जिसके बारे में उनका मानना है कि यह राज्य को कमजोर करने के व्यापक एजेंडे का हिस्सा है।
बाजवा ने इस बात पर जोर दिया कि यह महज एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि पंजाब के अधिकारों को और कमजोर करने के लिए केंद्र द्वारा एक रणनीतिक कदम है। बाजवा ने कहा, “पंजाब के गांवों से बना चंडीगढ़ हमेशा से पंजाब के वैध दावे का हिस्सा रहा है। यह कदम पंजाब की गरिमा पर हमला है और संघवाद के सिद्धांतों का उल्लंघन है।” उन्होंने चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश के लिए अलग कैडर बनाने के केंद्र के पिछले कदम पर भी प्रकाश डाला, जिससे पंजाब और हरियाणा के बीच 60:40 अधिकारी पोस्टिंग अनुपात और कमजोर हो गया।
बाजवा ने कहा, “चंडीगढ़ के लिए केंद्र द्वारा अलग कैडर बनाना शहर में पंजाब की हिस्सेदारी को कम करने की दिशा में एक और कदम है। यह निर्णय लंबे समय से चली आ रही उस प्रथा को कमजोर करता है, जिसने चंडीगढ़ के प्रशासन में पंजाब और हरियाणा दोनों के लिए समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया है।”
इसके अलावा, बाजवा ने बताया कि दिल्ली के उदाहरण का अनुसरण करते हुए सलाहकार पद को समाप्त करने और इसे मुख्य सचिव के पद से बदलने का केंद्र का निर्णय चंडीगढ़ को स्थायी रूप से केंद्र शासित प्रदेश में बदलने के व्यापक प्रयास का संकेत देता है। बाजवा ने कहा, “चंडीगढ़ का पद हमेशा अस्थायी था – जब तक कि इसे पंजाब को हस्तांतरित नहीं किया जाता।”
विपक्ष के नेता ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की चुप्पी पर भी आश्चर्य व्यक्त किया। बाजवा ने सुझाव दिया कि मान की निष्क्रियता केंद्र की नीतियों की मौन स्वीकृति को इंगित करती है, इसे पंजाब के लोगों के साथ विश्वासघात कहा। बाजवा ने कहा, ‘‘इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री की चुप्पी गंभीर चिंता पैदा करती है और यह संकेत देती है कि वह चंडीगढ़ पर पंजाब के दावे को कमजोर करने के लिए भाजपा के साथ सहयोग कर रहे हैं।’’
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